शादी का निमंत्रण

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    एक मई की शाम हमसे, एक मित्र मिलने आए थे।
साथ पुत्री के लग्न का निमंत्रण भी लाए थे।
उस दौर में हम भी कुछ, मिलनसार थे माने जाते।
शादियां हो या सगाई, बस हम ही हम नज़र आते।
बारात-स्वागत से भी पहले, पहुंचने का ख्याल था।
सूट पहना सबसे महंगा, भई इज्जत का जो सवाल था।
देख गहनों मे दबी बीवी को, मै भी मुस्काया।
मान कितना गुना होगा, सोच के ये हर्षाया।
चल पड़ी गाड़ी हमारी, रुकने की क्या बात थी।
था अंधेरा बहुत, शनि की वह निराली रात थी।
थी सड़क सुनसान, फिर भी दिल में बहुत जोश था।
सामने था रास्ता बंद, बस उड़ने लगा होश था।
चार तगड़े-मोटे, पुरुषों ने हमको घेर डाला।
हाय किस विपदा से अपना, पढ़ने लगा आज पाला।
भाईगिरी के भाषा में फिर, उसने हमको फटकारा।
पकड़कर कॉलर फिर उसने, गाड़ी से हमको उतारा।
समझने को रह गया क्या, अब तो सब कुछ साफ था।
गहने रूपए कोट छीना, क्या यही इंसाफ था।
दबे स्वर में हम भी बोलें, होंठों के पट हमने खोले।
आज समझा, सर मुंडाते कैसे पड़ जाते हैं ओले।
जाने क्यों, अब शादियों के नाम से ही कांप जाता।
फाड़ देता हूं हमेशा, जब कोई भी कार्ड आता।